SHIBU SOREN
Shibu Soren, former Jharkhand CM, passes away at 81: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक संरक्षक शिबू सोरेन का लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के श्री गंगाराम अस्पताल में 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
शिबू सोरेन को सोमवार सुबह 8:56 बजे अस्पताल ने मृत घोषित कर दिया। शिबू सोरेन कई बीमारी से पीड़ित थे और डेढ़ महीने पहले उन्हें स्ट्रोक भी हुआ था। वह एक महीने से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे।
इन बिमारियों के कारण हुआ Shibu Soren का निधन
शिबू सोरेन का निधन लंबी बीमारी के कारण हुआ। वे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन का मुख्य कारण किडनी की पुरानी बीमारी, डायबिटीज, हृदय संबंधी जटिलताएं और हाल ही में आया ब्रेन स्ट्रोक बताया गया है। वे काफी समय से डायलिसिस पर थे और उनकी बायपास सर्जरी भी हो चुकी थी।
जुलाई 2025 में उनके स्वास्थ्य में थोड़ा सुधार देखा गया था, लेकिन अगस्त की शुरुआत में उनकी हालत दोबारा बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। दिल्ली के एक अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में उनका इलाज चल रहा था। उनके आखिरी समय में बेटे और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पत्नी कल्पना सोरेन और पूरा परिवार उनके साथ मौजूद था।
झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने पिता को खोने के बाद क्या कहा?
शिबू सोरेन के पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद दिल्ली में मौजूद हैं और अस्पताल में ही थे जब उन्होंने अपने पिता को खो दिय। सीएम हेमंत सोरेन ने अपने पिता के निधन की जानकारी साझा करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं…’
Shibu Soren को गुरुजी के नाम से जाना जाता था
शिबू सोरेन को झारखंड में स्नेहपूर्वक ‘गुरुजी’ के नाम से जाना जाता था। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और राज्य में आदिवासी अधिकारों की लड़ाई के अग्रदूत माने जाते थे। उन्होंने अलग झारखंड राज्य की स्थापना के आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई और लंबे संघर्ष के बाद इस सपने को साकार करने में अहम योगदान दिया।
शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी रहे और उनका राजनीतिक जीवन राज्य के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में एक प्रेरणास्रोत के रूप में दर्ज है। उनकी छवि एक जननेता की थी, जिन्होंने हमेशा हाशिए पर खड़े समुदायों की आवाज़ बुलंद की।