पीएम मोदी मत्स्य संपदा योजना की शुरुआत सितंबर 2020 को की गई थी. सरकार की इस योजना का मकसद मछली पालन करने वाले लोगों को नई तकनीक से रूबरू कराना और उन्हें सुविधाएं मुहैया कराना है, ताकि वे कम समय और कम वक्त में ज्यादा मछली का उत्पादन कर सकें और बढ़िया मुनाफा कमा सकें.
झारखंड में कैसे रंग का रही योजना
झारखंड राज्य में इस योजना को काफी अच्छा रिस्पॉन्स देखने को मिल रहा है. राज्य के मत्स्य विभाग के अधिकारी सरकार द्वारा चलाई गई ये योजना झारखंड में काफी सफल रही है. न सिर्फ लोगों ने इसे अपनाया है बल्कि अब मछली पालन को एक नया व्यवसाय बना रहे है और बढ़िया आमदनी भी कर रहे है
बायोफ्लॉक तकनीक ने बदली तस्वीर
पहले तो भारत में बायोफ्लॉक तकनीक का इस्तेमाल नहीं होता था. लेकिन इस योजना के आने के बाद झारखंड में इसे अपनाया जा रहा है, जिसका असर भी दिखाई दे रहा है इस तकनीक में बिना तालाब खुदवाए टैंक में मछली पाली जाती है. एक टैंक से लगभग 250 से 300 किलो तक मछली तैयार की जाती है. यह मछली सिर्फ 6 महीने में तैयार हो जाती है.
लाभार्थी की कामयाबी की कहानी
इस योजना का लाभ उठाने वाले झारखंड के एक किसान ने बताया कि यह काम 2018 में शुरू किया था. अब उनके पास 70 से भी ज्यादा टैंक हैं और वे मछली पालन के साथ-साथ पर्यटन (रिजॉर्ट, पार्क, वॉटर पार्क) भी चला रहे हैं. लाभार्थी को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत 50 बायोफ्लॉक टैंक मिले थे. वह कहते हैं कि इस योजना से उन्हें काफी फायदा हुआ और उनकी आमदनी भी बढ़ गई.
कम खर्च, ज्यादा मुनाफा
बायोफ्लॉक तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे कम पानी और कम जगह में ज्यादा मछली तैयार की जा सकती है. इसकी वजह से किसान अब तालाब और पोखर पर निर्भर नहीं हैं.इससे उनकी मेहनत कम हो गई है और मुनाफा बढ़ गया है.
मछली पालन बना मुनाफे का सौदा
सरकार कि इस योजना की मदद से झारखंड में सैकड़ों किसान और युवा मछली पालन को अपनाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं. सरकार कि यह योजना सिर्फ रोजगार नहीं दे रही, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर भी बना रही है. अब मछली पालन एक संगठित उद्योग बनता जा रहा है, जिससे गांव और शहर दोनों के लोग जुड़ रहे हैं.