Jharkhand politics: झारखंड एक राज्य नहीं, एक संघर्ष की परिणति है। यह उस मिट्टी का नाम है, जो सदियों से लूटती रही, जलती रही, लेकिन झुकी नहीं। यह वह भूमि है जहां शहीद निर्मल महतो का खून बहा, जहां शिबू सोरेन जैसे आंदोलनकारी ने संसद को झकझोरा, और जहां आज भी हज़ारों गांव अपनी ज़मीन, जंगल और अस्मिता को बचाने के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।
Jharkhand politics: अलग राज्य का सपना पूरा हुआ?
लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इस राज्य को मिलने वाली आज़ादी एक छलावा साबित हुई। 2000 में अलग राज्य बनने के बाद जिस उम्मीद से जनता ने नई सुबह का इंतज़ार किया था, वो सुबह कभी आई ही नहीं। जो भी सरकारें आईं, उन्होंने इस राज्य को सिर्फ लूट की ज़मीन समझा। दिल्ली में बैठी सरकारें और रांची में बैठी कठपुतलियां दोनों ने मिलकर झारखंड के साथ सौदा किया। खनिजों की नीलामी की गई, जंगलों को कॉरपोरेट कंपनियों को सौंप दिया गया, और विस्थापन को विकास का नाम देकर आदिवासियों को उनके ही घर से उजाड़ दिया गया।
Jharkhand politics: झारखंड को एक्सपेरिमेंटल लैब बना दिया गया
बीजेपी का राज इस लूट की सबसे बेबाक मिसाल है। रघुवर दास की सरकार के दौरान झारखंड को एक एक्सपेरिमेंटल लैब बना दिया गया जहां आदिवासी पहचान मिटाने के लिए कानूनों से छेड़छाड़ की गई, CNT और SPT एक्ट को कमजोर करने की कोशिश हुई, और जो भी आवाज़ उठी उसे माओवादी कहकर दबा दिया गया। बेरोजगारी बढ़ती रही, शिक्षा का हाल बेहाल रहा, और खनन माफिया फलते-फूलते रहे। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नाम पर जो किया गया, उसमें न साथ मिला, न विकास, बस सत्ता और पूंजीपतियों की जेबें भरी गईं।
Jharkhand politics: क्या हेमंत पूरा करेंगे सपना?
लेकिन अगर इस अंधेरे दौर में कहीं थोड़ा उजाला था, तो वह हेमंत सोरेन की सरकार में दिखा। हां, यह सच है कि उनकी सरकार से कई उम्मीदें थीं जो पूरी नहीं हो सकीं। भ्रष्टाचार के आरोप लगे, अफसरशाही बेलगाम रही, और जनता को योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाया। लेकिन एक अंतर था इस सरकार ने आंदोलन को कुचला नहीं, आदिवासियों को माओवादी नहीं कहा, CNT-SPT एक्ट से खिलवाड़ नहीं किया। जो बातें आज के दौर में मामूली लगें, लेकिन झारखंड जैसे राज्य में यह एक बड़ी बात है। हेमंत सोरेन ने कम से कम यह साबित किया कि वह दिल्ली के इशारे पर नहीं, झारखंड के दर्द के साथ खड़े हैं।
Jharkhand politics: शिबू सोरेन से बेहतर शायद ही राज्य को किसी ने समझा
जब शिबू सोरेन को गुरुजी कहा जाता है, तो वह सिर्फ एक सम्मानसूचक शब्द नहीं है। वह एक विरासत है। उन्होंने यह साबित किया था कि एक गांव का बेटा संसद में भी खदान माफिया के खिलाफ बोल सकता है, दिल्ली दरबार की आंखों में आंख डाल सकता है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि आज शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत कमज़ोर पड़ गई है, और उनके बेटे के आसपास जो सत्ता का जमावड़ा है, उसने उस आंदोलन की धार को कुंद कर दिया है। फिर भी, यह न भूलें कि शिबू सोरेन झारखंड की आत्मा हैं और उन्हें भुला देना अपने संघर्ष को भुला देना होगा।
Jharkhand politics: झारखंड को निर्मल महतो की जरूरत है
निर्मल महतो का नाम लेना भी आज की राजनीति को आईना दिखाना है। जिस युवा नेता ने अलग झारखंड के लिए अपनी जान दे दी, उसकी शहादत पर आज भी सन्नाटा पसरा है। उन्हें मारने वालों को राजनीतिक संरक्षण मिला, लेकिन उनके विचारों को कोई आगे नहीं बढ़ा सका। वह विचार आज भी अधूरा है। और झारखंड की नई पीढ़ी को तय करना है कि वो उस विचार को फिर से जगाएगी या उसे इतिहास के कोनों में दफ्न रहने देगी।
Jharkhand politics: जयराम महतो ने युवाओं को रास्ता दिखाया है
लेकिन अब झारखंड की राजनीति में एक नई हलचल है एक नया नाम, एक नई भाषा और एक नया तेवर। जयराम महतो। वह कोई परंपरागत नेता नहीं हैं। उनके पास पार्टी का बड़ा झंडा नहीं है, लेकिन जनता की आंखों में उम्मीद की चमक ज़रूर है। वह बोलते हैं तो रांची की दीवारें हिलती हैं, और दिल्ली तक खलबली मचती है। जयराम महतो में झारखंड का वह गुस्सा है, जिसे सालों तक कुचला गया। वह गुस्सा अब दिशा मांग रहा है और शायद यही नेता वह दिशा दे सकता है।
यह लड़ाई सिर्फ चुनाव की नहीं, अस्तित्व की है
अब वक्त आ गया है जब झारखंड की जनता को समझना होगा कि यह लड़ाई सिर्फ चुनाव की नहीं, अस्तित्व की है। हमें तय करना है कि हम फिर से सत्ता के दलालों को चुनेंगे, या उस नेतृत्व को आगे लाएंगे जो संघर्ष से निकला हो। यह राज्य सिर्फ सरकारों से नहीं बदलेगा, यह बदलेगा तब, जब जनता अपने नेतृत्व को खुद गढ़ेगी उसी तरह, जैसे उसने शिबू सोरेन को गढ़ा था। झारखंड का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। यह लड़ाई अब भी ज़िंदा है और अगर आप इस ज़मीन के बेटे हैं, तो यह ज़िम्मेदारी भी आपकी है।