दलाई लामा अपने जन्मदिन पर चुन सकते हैं उत्तराधिकारी
Dalai Lama: 6 जुलाई, वह दिन जब दलाई लामा अपना 90वां जन्मदिन मनाएंगे— और इसी मौके पर दुनिया भर की निगाहें एक सवाल पर टिकी हैं: क्या दलाई लामा अपने उत्तराधिकारी का ऐलान करेंगे?तिब्बती निर्वासन सरकार, लाखों शरणार्थी और दुनिया की इस क्षण की प्रतीक्षा में हैं। यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक समूची संस्कृति, एक लुप्त होते राष्ट्र और उस करुणा की मशाल को आगे बढ़ाने का प्रश्न है, जिसने आधी सदी से भी ज्यादा समय से तिब्बतियों को जीवित रखा है।
Dalai Lama: चीन में आखि़र क्यों इतनी हलचल
इसी बीच बीजिंग की दीवारों के पीछे भी हलचल तेज है। चीन चाहता है कि अगला दलाई लामा उनकी मर्जी से चुना जाए — ताकि वह धर्म को भी अपनी लाल झंडी के नीचे लाकर खड़ा कर सके। लेकिन दलाई लामा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है अगर किसी को भी राजनीतिक कारणों से अगला उत्तराधिकारी चुना गया तो वो किसी हाल में मान्य नहीं होगा
तिब्बत की खूबसूरत पहाड़ियों में बसा एक छोटा-सा गाँव था तक्त्सेर, जहाँ खेतों में काम करते किसान, भेड़-बकरियाँ चराते लोग और छोटे बच्चे और पहाड़ी गीतों से और ताल मिलती जिंदगियाँ थीं। 6 जुलाई 1935 को एक साधारण किसान परिवार में एक ऐसे बालक ने जन्म लिया, जो बाद में दुनिया के सबसे बड़े धर्म गुरुओं में शुमार हो गया
मां-बाप को कहाँ पता था कि यह बालक सिर्फ उनका बेटा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों को अध्यात्म की रहा दिखाएगा को पूरी दुनिया को शांति का पैगाम देगा। नन्हें से पांव वाला बच्चा मिट्टी में खेलता, मां की गोद में सोता वह बालक तिब्बती लोककथाओं में कही जाने वाली भविष्यवाणियों का ही जीवंत रूप था।
Dalai Lama: खोज और पहचान — दो साल में संत
महज दो वर्ष की उम्र में जब वह ठीक से बोल भी नहीं पाता था, तिब्बती भिक्षुओं की दूरदर्शिता ने उसमें कुछ अनोखा पहचाना। वे 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म की तलाश में थे, और कई संकेतों, सपनों, तथा विशेष परीक्षणों के बाद इस छोटे बालक को चुना गया। जेत्सुन जम्फेल नगवांग लोबसांग येशे तेनजिन ग्यात्सो, जिसका अर्थ था — पवित्र ईश्वर जैसा, कोमल महिमा, करुणामय, धर्म के रक्षक और ज्ञान के महासागर की तरह भरा हुआ।
Dalai Lama: पोटला महल — बचपन से संन्यास तक
ल्हासा के विशाल पोटाला महल, जिसके हज़ार कमरे हजारों रहस्यों को समेटे थे, वही इस बालक का नया घर बना। लेकिन यही से शुरू हुई उसकी वो कठोर परीक्षा जिसके लिए वो तैयार तक नहीं था। कठोर शिक्षा — बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन, ध्यान, तर्कशास्त्र। लेकिन भीतर का जिज्ञासु बच्चा अभी भी जीवित था
अमेरिकन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने भेजी घड़ी को खोलकर बार-बार देखता। महल में रखी पुरानी कारों की मरम्मत करता रहता — एक बार तो उसे महल के दरवाजे में ही ठोक दिया। उसके चेहरे पर हमेशा सूरज जैसा तेज पर हमेशा एक पयारी मुस्कान रहती, मानो दुनिया को अपने कोमल हृदय से जीतने आया हो।
Dalai Lama: जब छोटी उम्र में मिली बड़ी जिम्मेदारी
पर बचपन हमेशा नहीं टिकता, साल 1950, जब वह सिर्फ 15 साल का था, चीन की सेना ने तिब्बत पर हमला कर दिया। बौद्ध भिक्षुओं और जनता ने उसे जल्दबाज़ी में तिब्बत का राष्ट्राध्यक्ष बना दिया। एक ऐसा बालक जो अभी जीवन को समझ ही रहा था, कि उसे अचानक अपने पूरे देश का भाग्य संभालना पड़ा।
Dalai Lama: विद्रोह, आक्रोश और निर्वासन
1959, जब तिब्बतियों ने चीन के खिलाफ बगावत छेड़ी तब चीनी सैनिकों ने निर्दयता से उनके विद्रोह को कुचल कर रख दिया, हजारों बेगुनाह लोग मारे गए।तब लोगों ने दलाई लामा से कहा — “आपको जीवित रहना है ताकि तिब्बत जीवित रह सके।”उन्होंने अपनी संतुलित बुद्धि और करुणा के साथ फैसला लिया और कठिन पहाड़ी रास्तों से होते हुए भारत की ओर चल पड़े।
जब माओ ज़ेडोंग को उनके पलायन की खबर मिली, उसने व्यथित होकर कहा — “इसका मतलब है, हमने युद्ध ही हार दिया।”
भारत में नया ठिकाना, धर्मशाला
थके-हारे, भूखे और भयभीत तिब्बती शरणार्थियों के साथ दलाई लामा भारत तब, अब वो अपनी धरती छोड़ पराय मुल्क में आए। तब जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें हाथ फैलाकर अपनाया और धर्मशाला को उनका नया घर बना दिया। यहीं से उन्होंने निर्वासित तिब्बती सरकार का संचालन शुरू किया।
धर्मशाला धीरे-धीरे “लिटिल ल्हासा” बन गया, जहाँ तिब्बती संस्कृति की खुशबू हर गली में महक सी फैली है। भारत ने दलाई लामा को सम्मानित अतिथि माना, लेकिन चीन ने हमेशा इसे चुभन की तरह देखा।
उत्तराधिकारी की रहस्यमयी गाथा
दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर सवाल हर समय बात होती रहती है उन्होंने खुद कहा कि अगला दलाई लामा महिला भी हो सकता है। या उनकी आत्मा किसी वयस्क में प्रवेश कर सकती है। या वे किसी पशु या कीट के रूप में भी जन्म ले सकते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि संभव है, वे इस परंपरा की अंतिम कड़ी ही हों। पर सबसे ज़ोर देकर कहा, “कोई भी उत्तराधिकारी जो चीन जैसे राजनीतिक हितों के लिए चुना जाएगा, वह तो किसी हाल मान्य नहीं होगा।”
करुणा का संदेशवाहक
दलाई लामा ने अपना पूरा जीवन अहिंसा, करुणा और मानवीय भाईचारे के लिए दिया है। साल 1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला। दुनिया के हर कोने में उन्होंने यह संदेश दिया कि “असली शांति बाहरी युद्ध से नहीं, भीतर की विजय से आती है।”